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साथी ग्रहो वाली कुण्डली (Sathi Graho Wali Kundli In Lal Kitab)
जब किसी कुण्डली में ग्रह एक दूसरे की राशी में या एक दूसरे के पक्के घरों में अदल-बदल कर बैठ जायें तो ऎसी कुण्डली साथी ग्रहों वाली कुण्डली (Sathi Graho wali Kundli) कहलाती है.
उपरोक्त कुण्डली में ग्रह दो प्रकार से आपस में साथी बने हैं. पहले प्रकार में शुक्र व शनि का आपस में राशी परिवर्तन योग (Sign Change Yog Of Venus And Saturn) बना है अर्थात शुक्र-शनि की राशी मकर( Sign Of Venus And Saturn In Capricorn) में व शनि-शुक्र की राशि तुला (Sign Of Saturn And Venus In Libra) में स्थित है, इस प्रकार यह कुण्डली साथी ग्रहो वाली कुण्डली कहलाती है.
इसी तरह से सूर्य और बृहस्पति एक-दूसरे के पक्के घरों में बैठे हैं. अर्थात सूर्य नवम भाव (Sun In Ninth House) जो कि बृहस्पति का पक्का घर (Pakka Ghar Of Jupiter) है, में स्थित है तथा बृहस्पति प्रथम भाव जो कि सूर्य का पक्का घर (Pakka Ghar Of Sun) है, में स्थित होने से भाव परिवर्तन नामक योग (Bhava Change Yog) बन रहा है अतः इस प्रकार की कुण्डली भी साथी ग्रहो वाली कुण्डली कहलाती है.साथी ग्रहो वाली कुण्डली में शुभ फल (Auspicious Result In Sathi Graho Wali Kundali) देने की प्रवृत्ति में वृद्धि हो जाती है. साथ ही एक लाभदायक स्थिति यह भी है कि यदि साथी ग्रह आपस में शत्रु ग्रह हो तो भी उसका परिणाम शुभ होगा और उन दोनो की आपस में नकारात्मकता समाप्त हो जायेगी जैसे कि सूर्य और शनि. परन्तु बुध ग्रह को इसमें अपवाद मान जाता है.
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