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महेन्द्र कूट (Mahendra Koot)
भारतवर्ष भारतीय महाद्वीप का सबसे बड़ा देश है। इस देश की विशालता और अनेकता में एकता विश्व के लिए आदर्श स्वरूप है क्योंकि भारत जितना विशाल है उतनी ही विस्तृत इसकी सभ्यता, संस्कृति, भाषा, ज्ञान और चिंतन है। ज्ञान, चिंतन एवं संस्कृति के विस्तृत और विविध होने के बावजूद इसका मूल स्वरूप एक ही है। चिंतन की बात करें तो उत्तर भारत में भगवान शिव के बड़े पुत्र को कार्तिकेय के नाम से पूजा जाता है तो दक्षिण(South) में कर्तिकेय मुरूगन स्वामी(Murugan Swami) के नाम से पूजित होते हैं। भगवान कृष्ण की बात करें तो उत्तर में माधव, गोपाल, कृष्ण के नाम से जाने जाते हैं तो दक्षिण में वेणु गोपाल के नाम से विख्यात हैं यानी नाम चाहे कुछ हो परिणाम और विषय वस्तु समान है, यही बात ज्योतिष में भी लागू है।
उत्तर भारतीय ज्योतिष(North Indians Astrologer) और दक्षिण भारतीय ज्योतिष(South Indian Astrologer) में कई जग़ह विविधता है फिर भी इनमें समानता का भाव नज़र आता है। दोनों में समानता के क्रम में सबसे पहले हम दशा चक्र की बात करते हैं उत्तर भारत में दशा चक्र में विंशोत्तरी दशा से फलादेश(Prediction) किया जाता है वहीं दक्षिण भारत में अष्टोत्तरी दशा से फलादेश करने की प्रथा है। प्रथा अलग होने के बावजूद परिणाम में दोनों लगभाग समान होते हैं। दक्षिण भारतीय ज्योतिष एवं उत्तर भारतीय ज्योतिष में एक प्रमुख अंतर यह भी है कि दक्षिण भारत में प्रतिदिन डेढ़ घंटे का समय शुभ काम के लिए अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि यह राहु काल(Rahu Kal) होता है। सप्ताह में प्रत्येक दिन का यह समय काल तय होता है। राहु काल की तरह उत्तर भारत में भद्रा होता है, परंतु इसका कोई निश्चित समय नहीं होता है।
ज्योतिष की बात करें तो उत्तर भारत में दशा चक्र में विंशोत्तरी दशा से फलादेश किया जाता है वहीं दक्षिण भारत में अष्टोत्तरी दशा से फलादेश करने की प्रथा है। दक्षिण भारत में प्रतिदिन डेढ़ घंटे का समय शुभ कार्यों के लिए निसिद्ध माना जाता है, सप्ताह में प्रत्येक दिन का यह समय काल तय होता है इसे राहु काल के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में राहु काल के स्थान पर भद्रा आता है। भद्रा राहुकाल की तरह अशुभ होता है परंतु राहुकाल की तरह इसका समय निश्चित नहीं रहता है और इसकी अंतिम दो घड़ियां अर्थात 48 मिनट किसी भी कार्य हेतु शुभ माना जाता हैं।
उत्तर भारतीय ज्योतिष में वैवाहिक कुण्डली (Marriage Kundli) मिलान में भी काफी अंतर है। उत्तर भारत में वैवाहिक कुण्डली को देखते समय जहां अष्टकूट से विचार किया जाता है वहीं दक्षिण भारतीय ज्योतिष में बीस कूटों(20 Koot) से विचार किया जाता है। बीस कूटों में से एक है महेन्द्र कूट। महेन्द्र कूट के विषय में प्रश्न मार्ग में बताया गया है कि कन्या के नक्षत्र से वर का नक्षत्र (Male nakshtras from Female Nakshatras) 4, 7, 10 हो तो महेन्द्र कूट बनता है। महेन्द्रकूट मूलत: चतुर्थ नक्षत्र होता है और चतुर्थ से चतुर्थ उपेन्द्र नक्षत्र होता है।
महेन्द्रकूट के अन्तर्गत कन्या के नक्षत्र से वर का नक्षत्र 4, 7, 10, 13, 16, 19, 22, या 25 वां होता है तो यह बहुत ही शुभ माना जाता है।इस कूट के अन्तर्गत कन्या के नक्षत्र से वर का नक्षत्र 1,2,3,5,6,8,9,11,12,14,15,17,18,
19,20,21,23,24,26 या 27 हो तो इसे अशुभ माना जाता है। विवाह के सम्बन्ध में महेन्द्र नक्षत्र से आंकलन करने का कारण यह है कि इससे पता चलता है कि विवाह के पश्चात परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी तथा उपेन्द्र से यह ज्ञात होता है कि दम्पत्ति के वैवाहिक जीवन में संतान सुख के सम्बन्ध में स्थिति कैसी रहेगी। अगर आप दक्षिण भारतीय पद्धति से वैवाहिक कुण्डली का आंकलन (Assessment of Marriage Kundli from Indian Method) करते हैं तो आपके लिए इस कूट का मिलान करना आवश्यक होगा।
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